देव नदी सरस्वती का वर्तमान में प्लक्षप्रस्रवण से उद्गम पौराणिक प्रमाण
वर्तमान समय में जिला अम्बाला के मुलाना-बराडा क्षेत्र में बहने वाली नदी मारकण्डा प्राचीन काल की सरस्वती नदी है। यह तथ्य महाभारत ग्रंथ का विस्तृत अध्ययन करने पर सिद्ध हो जाता है। इस प्रसंग का उल्लेख पौराणिक साहित्य में भी मिलता है। ये प्राचीन ग्रन्थ स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं कि ऋग्वेद में वर्णित प्लक्ष सरस्वती नदी महाभारत काल में काफी क्षीण हो गई थी। यह धारा पुनः वृक्ष के मूल से प्रकट हुई थी। पौराणिक साहित्य का अध्ययन करने पर प्लक्षप्रस्रवण का भी वर्णन प्राप्त होता है। प्लक्षप्रस्रवण आज कल जिला सिरमौर में काला आम्ब नाम स्थान पर विद्यमान है। इसी वन में प्लक्ष के वृक्ष अधिकता से मिलते हैं। ऋषि मार्कण्डेय जी का आश्रम भी इसी वन में स्थित है। पुराणों के अनुसार सरस्वती नदी जो कि प्राचीन समय में विशाल काय समुद्र के समान थी, महाभारत काल में भयंकर सूखा पड़ने के कारण विलुप्त होने को थी। इस धारा का मुख्य भाग पाताल लोक में चला गया था। शेष अंश पृथ्वी पर बचा रहा। वैदिक साहित्य में उल्लेखों के अनुसार यह धारा बिखर कर अन्य सात धाराओं में विभक्त हो गई थी। वह भाग जो धरातल में चला गया था, वह भाग भारत वर्ष के उत्तर पश्चिमी भाग में पृथ्वी की सतह से स्रोतों के रूप में जगह-जगह प्रस्फुटित हुआ। सदियों तक मानसून की वर्षा न होने के कारण यहाँ की भूमि का जल स्तर एवं नदी की धारा का प्रवाह काफी घट गया था। यहाँ पर रहने वाले निवासी जल के अभाव में इधर-उधर भटकने लगे। कुछ लोग अन्य स्थानों पर जाकर बस गये। अफगानों के लगातार हमलों के कारण अन्य प्रजातियाँ एवं जनसंख्या विलुप्त हो गई। जो लोग बच गये उनके मानस पटल पर इस क्षेत्र की स्मृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी छाप छोड़ती गई। इस तरह लोगों की स्मृति भी क्षीण होती गई। इसी स्मृति को रेशियल मेमोरी भी कहा जाता है। इसी स्मृति के कारण ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण समय के साथ आगे बढ़ता रहा।
श्री मार्कण्डेय महान तपस्वी ऋषि थे। इनके ही नाम पर एक महापुराण का नाम मार्कण्डेय पुराण है। यह सम्मान अन्य किसी ऋषि को प्राप्त नहीं है। सरस्वती नदी प्लक्ष के मूल से ऋषि मार्कण्डेय जी के आश्रम से प्रस्फुटित होकर संस्कृत एवं परिष्कृत हो गई थी। स्थानीय जनमानस इस धारा को मार्कण्डेय नदी के नाम से जानने लगे और इस नदी को बहुत ही ज्यादा सम्मान देते हैं। इस नदी के तट पर बहुत से मन्दिरों का निर्माण किया गया। रविवार के दिन यहाँ के स्थानीय निवासी इस पवित्र स्थान पर ढोल-नगाड़े बजाकर मार्कण्डेय नदी की पूजा अर्चना करते हैं। वर्ष के अधिकतर समय में इस धारा में जल का अभाव रहता है; परन्तु इससे इस नदी की महत्ता कम नहीं होती है। वर्ष भर यहाँ पर पूजा चलती रहती है। मानसून के समय यह सूखी सी जल धारा समुद्र के समान विकराल रूप धारण करती है। इस समय भूमि में जल स्तर बढ़ जाता है। सभी स्थानों पर फसलें एवं वृक्ष लगा दिये जाते हैं। मानसून के जल से यहाँ की भूमि में हिमालय पर्वत की श्रेणियों से बहकर मृदा आती रहती है। यही मृदा यहाँ की भूमि को उपजाऊ बनाती है। यह जल धारा यहाँ के निवासियों के लिए जीवन दायिनी है। इसके जल से ही यहाँ पर भरपूर फसलें पैदा होती हैं।
इसी क्षेत्र में अमरी, ओमला, बेगना एवं टांगरी नाम की बरसाती नदियाँ भी बहती हैं, परन्तु अन्य किसी जल धारा को यह सम्मान प्राप्त नहीं है। किसी अन्य नदी की पूजा इस तरह से नहीं की जाती है। यह तथ्य भी मार्कण्डेय नदी की महानता सिद्ध करता है। पौराणिक साहित्य में सरस्वती नदी की एक और शाखा का वर्णन भी प्राप्त होता है। इस धारा को सांभ्रमती के नाम से उल्लेखित किया गया है। वर्तमान समय की साबरमती नदी जो गुजरात प्रान्त में बहती है, सरस्वती नदी की ही एक शाखा है। गुजरात प्रदेश में सारस्वत कुलीन ब्राह्मणों का आवास है। सरस्वती नदी से सम्बन्धित होने के कारण ही इस समुदाय का नाम सारस्वत है। साबरमती नदी का यह क्षेत्र लाल पीली मिट्टी का बना हुआ है। इस क्षेत्र की मृदा (भूमि) का रंग लाल होने का प्रसंग भी स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में मिलता है। प्राचीन काल में ऋषि वसिष्ठ एवं ऋषि विश्वामित्र के आश्रम सरस्वती के किनारे पर ही थे। किसी प्रसंग को लेकर दोनों ऋषियों में शत्रुता हो गई। ऋषि विश्वामित्र बहुत ही क्रोधी स्वभाव वाले थे। ऋषि विश्वामित्र ने सरस्वती नदी से आग्रह किया कि वह ऋषि वसिष्ठ के आश्रम को मुनि के साथ ही बहा कर ऋषि विश्वामित्र के निकट ले आये। मैं ऋषि वसिष्ठ से युद्ध करूँगा और वसिष्ठ ऋषि को मार दूँगा। सरस्वती ने ऐसा करने को मना कर दिया। इस पर ऋषि विश्वामित्र बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने शाप देकर सरस्वती जल को रक्त रंजित कर दिया। इस प्रकार सरस्वती की इस साबरमती धारा में रक्त रंजित जल बहने लगा। विभिन्न स्थानों से राक्षस वहाँ आकर प्रवास करने लगे। समयानुसार राक्षस इस क्षेत्र के निवासी हो गये। यह स्थान अब राक्षसों का आवास हो गया था। इससे सरस्वती को बहुत दुख हुआ। सरस्वती ने ऋषि वसिष्ठ से प्रार्थना की और शाप मुक्त करने का आग्रह किया। ऋषि वसिष्ठ ने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह प्लक्ष वृक्ष के पास गये। वहाँ से प्लक्ष वृक्ष के मूल से सरस्वती जल स्रोत को प्रस्फुटित कर जल की निर्मल, स्वच्छ धारा को जन्म दिया। इस जल धारा से रक्त रंजित जल स्वच्छ एवं संस्कृत हो गया। इस तरह यह क्षेत्र राक्षस विहीन हुआ। परन्तु आज भी इस साबरमती क्षेत्र की भूमि का रंग लाल पीला है।
ततः प्रभृति सम्प्राप्तं कथं तोयं प्रकीर्तय। सरस्वत्या महाभाग सर्वं विस्तरतो वद।।२।। सूत उवाच— बहुकालं प्रवाहः स सरस्वत्या द्विजोत्तमाः। महान रक्तमयो जातो भूतराक्षससेवितः।।३।। कस्यचित्त्वथ कालस्य वसिष्ठो मुनिसत्तमः। अर्बुदस्थस्तया प्रोक्तो दीनया दुःखयुक्तया।।४।। तवार्थाय मुने शप्ता विश्वामित्रेण कोपतः। रुधिरौघवहा जाता तपस्विजनवर्जिता।।५।। तस्मात्कुरु प्रसादं मे यथा स्यात्सलिलं पुनः। प्रवाहे मम विप्रेन्द्र प्रयाति रुधिरं क्षयम्।।६।। त्रैलोक्यकरणे विप्र संक्षये वा स्थितौ हि वा। नाशक्तिर्विद्यते काचित् तव सर्वमुनीश्वर।।७।।
उस दिन से लेकर कहो कि पुनः सरस्वती के प्रवाह में जल कैसे हुआ। हे महाभाग! यह सब विस्तार से कहो।।२।। सूत जी बोले— हे द्विजोत्तम! वह सरस्वती महानदी का प्रवाह बहुत काल पर्यन्त भूत तथा राक्षसों से सेवित महान् रक्तरूप को प्राप्त हुआ।।३।। पुनः किसी समय के अनन्तर आबु पर्वत पर विराजमान मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ जी से उसने (सरस्वती नदी) दुःखी होकर दीनता से कहा।।४।। हे मुनि! तुम्हारे निमित्त ही विश्वामित्र ने कुपित होकर शाप दिया। जिससे मैं रक्तसमूह को बहाने वाली हुई; तथा तपस्विजनों ने भी त्याग दिया।।५।। हे विप्रेन्द्र (ब्राह्मणों में श्रेष्ठ) जिस प्रकार पुनः जल हो जाये तथा मेरे प्रवाह में रक्त नाश को प्राप्त हो। ऐसी कृपा मुझ पर करो।।६।। हे विप्र! हे मुनीश्वर! तीनों लोकों की रचना संहार तथा पालन करने की सब शक्ति तुम्हारे में विद्यमान है। ऐसी कोई नहीं जो न हो।।७।।
वसिष्ठ उवाच— तथा भद्रे करिष्यामि यथा स्यात् सलिलं पुनः। प्रवाहे तव निर्याति सर्वं रक्तं परिक्षयम्।।८।। एवमुक्त्वा स विप्रर्षिरपर्वतात् धरातले। गतः प्लक्षतरुं यस्मादवतीर्णा सरस्वती।।९।। समाधिं संधाय निविष्टो धरणीतले। सम्भ्रमं परमं गत्वा विश्वामित्रस्य चोपरि।।१०।। वारुणेन तु मन्त्रेण वीक्षयन् वसुधातलम्। ततो निर्भिद्य वसुधां भूरितोयं विनिर्गतम्।।११।। रन्ध्रद्वयेन विप्रेन्द्रा लोचनाभ्यां निरीक्षणात्। एकस्य सलिलं क्षिप्रं यत्र जाता सरस्वती।।१२।। प्लक्षमूले ततस्तस्य वेगेनापहृतं बलात्। तद्रक्तं तेन सम्पूर्णं ततस्तेन महानदी।।१३।। द्वितीयस्तु प्रवाहो यः सम्भ्रमात्तस्य निर्गतः। सा च साम्भ्रमती नाम नदी जाता धरातले।।१४।। एवं प्रकृतिमापन्ना भूय एव सरस्वती। यत्पृष्टोऽस्मि महाभागाः सरस्वत्याः कृते द्विजाः।।१५।। एतत्सारस्वतं नाम व्याख्यानमतिबुद्धिदम्। यः पठेच्छृणुयाद्वापि मतिस्तस्य विवर्धते। सरस्वत्याः प्रसादेन सत्यमेतन्मयोदितम्।।१६।।
वसिष्ठ जी बोले— हे कल्याणी! मैं वैसे ही करूँगा जैसे पुनः जल हो। तुम्हारे प्रवाह में सब रक्त परम नाश हो जाये।।८।। ऐसा कहकर वह ब्रह्म ऋषि भूमि तल पर उतरकर उस प्लक्ष वृक्ष के पास गये।।९।। जहाँ से सरस्वती नदी का अवतार हुआ। वहाँ समाधि लगाकर विश्वामित्र के ऊपर परम संवेग (क्रोध करके) पृथ्वी के ऊपर बैठ गये।।१०।। पुनः वरुणदेवता सम्बन्धी मन्त्र के उच्चारण सहित तल को देखने लगे। उससे भूमि को भेदन कर बहुत जल निकला।।११।। हे विप्रेन्द्रों! जैसे देखने काल में एक ही अन्तःकरण की वृत्ति दोनों नेत्रों के गोलकों से दो रूप धार कर निकलती है। ऐसे ही यह प्लक्षमूल से प्रकट हुई सरस्वती वहाँ शीघ्र एक का ही जल दोनों छिद्रों के द्वारा निकला।।१२।। उसके पश्चात् उसका वह रक्त उस दूसरी धारा के द्वारा सम्पूर्ण बलपूर्वक अपहरण कर लिया वा बहा दिया। उसके द्वारा महानदी शुद्ध हो गई।।१३।। पुनः जो दूसरा प्रवाह उसके सम्भ्रम (संवेग या भयपूर्वक त्वरा) से निकला। वह पृथिवी पर सांभ्रमती नदी नाम से विख्यात हुई।।१४।। इस प्रकार वह सरस्वती नदी पुनः अपने स्वभाव (शुद्धरूप) को प्राप्त हुई। हे महाभाग द्विजों! यही सरस्वती के निमित्त करके आप ने मुझ को पूछा है। यह सारस्वत नामक व्याख्यान अति बुद्धि देने वाला है।।१५।। जो इसको श्रद्धा से पाठ करे वा सुने सरस्वती के प्रसाद से उसकी बुद्धि बढ़ जाती है। यह मैंने सत्य कहा है।।१६।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे श्रीहाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये सरस्वत्युपाख्याने सरस्वतीशापमोचनसाम्भ्रमत्युत्पत्तिवृत्तान्तवर्णनं नाम त्रिसप्तत्युत्तरशततमोऽध्यायः।।१७३।।
सरस्वती नदी नवीन परिदृश्य - संक्षिप्त विवरण
आज के समय में विभिन्न वैज्ञानिक तकनीकियों का आविष्कार हुआ है। यह नई वैज्ञानिक विधियाँ विभिन्न क्षेत्रों में लाभप्रद साबित हुई हैं। इन्हीं विधियों से सरस्वती नदी से सम्बन्धित ज्ञान में भी वृद्धि हुई है। उपग्रहों द्वारा प्राप्त चित्रों से पता लगा है कि राजस्थान, गुजरात एवं हरियाणा प्रदेश में विलुप्त सरस्वती एवं घग्गर नदी की गहराई में जल का विशाल सागर है। इसी सन्दर्भ में हरियाणा सरकार द्वारा भी भूमिगत सरस्वती जल स्रोत का उपग्रह की सहायता से अध्ययन किया गया है। हरियाणा सरकार की रपट के अनुसार कुरुक्षेत्र जिला के पेहोवा, थानेसर के समीप ब्रह्म एवं सन्निहित सरोवर, जिला यमुनानगर के मुस्तफाबाद, जिला अम्बाला के मुलाना-बराडा के सरस्वती क्षेत्र में भूमिगत जल की प्रचुर मात्रा पाई गई है। आज के समय में ही पेहोवा क्षेत्र के समीप बहुत सारे जल स्रोत हैं जो सर के नाम से प्रचलित हैं। यह स्थान अति पवित्र माना जाता है। यहाँ पर अनादि काल से हिन्दू अपने पूर्वजों का अर्पण तर्पण करते रहे हैं। पूर्वजों का श्राद्ध इस पवित्र स्थान पर करने से पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त होती है। यह पवित्र स्थान निश्चित ही सरस्वती धारा के क्षेत्र में है। यमुनानगर जिले का बिलासपुर एवं आदबद्री स्थान भी सरस्वती नदी का ही क्षेत्र है। बिलासपुर शब्द व्यासपुर का अपभ्रंश है। यही वह व्यासपुर है जहाँ पर वेद व्यास जी ने सरस्वती के पावन तट पर चारों वेदों की रचना की थी। यह सर्वविदित सत्य है कि सरस्वती देवी ज्ञान का स्रोत है, जिस किसी पर इनकी कृपा हो जाती है, वह परम ज्ञानी महापुरुष हो जाता है। इसी बिलासपुर में प्राचीनकालीन सरस्वती की एक और धारा प्रस्फुटित हुई थी और इस प्रांगण को हरा-भरा करती थी। इस धारा पर एक प्राचीन कालीन पुल भी स्थित है। वर्षों पूर्व लार्ड कनिंघम ने भी अपने लेखों में इस तथ्य को उल्लिखित किया था। भारतीय गजट में लार्ड कनिंघम का वर्णन मिलता है।
महाभारत काल में सरस्वती नदी के विलुप्त होने के बाद यह नदी हिमालय एवं शिवालिक पर्वत के प्रांगण में स्थानान्तरण पर भूमि से प्रस्फुटित हुई थी। इसी सन्दर्भ में एक तथ्य यह भी है कि हिमालय पर्वत पर एक और धारा भी सरस्वती के नाम से जानी जाती है। यह धारा थोड़ी दूर बहने के पश्चात् इसी घाटी की भूमि में समायोजित हो जाती है। एक अन्य धारा गुजरात प्रांत में भी सरस्वती के नाम से बहती है। इस धारा का उल्लेख महाभारत काव्य में निश्चित रूप से मिलता है। इस धारा का प्रवाह पश्चिम की ओर है। पश्चिम दिशा की ओर बहने के बाद यह धारा समुद्र में कच्छ की खाड़ी में विलीन हो जाती है। किंवदन्तियों के अनुसार हिमालय पर्वत से तीन धाराएँ यमुना, गंगा, एवं सरस्वती निकलती हुई प्रयाग नामक स्थान पर एकत्रित होती हैं। इस स्थान को त्रिवेणी कहते हैं। यह स्थान भी प्राचीन अनादि काल का है। प्रयाग में जिस स्थल पर यह तीनों धारायें मिलती हैं उस स्थान पर तीनों धाराओं की जल मिश्रण प्रक्रिया को सहज रूप से देखा जा सकता है। इस संगम स्थल पर गंगा जी का जल श्वेत वर्ण वाला, यमुना जी का धूम्र वर्ण वाला प्रतीत होता है। सरस्वती का जल विलुप्त होने के कारण यहाँ पर प्रकट नहीं होता है।
प्लक्ष वृक्ष भी सरस्वती नदी से सम्बन्धित है। यह संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश में प्लक्ष शब्द के दो अर्थ दिये गये हैं। एक अर्थ गूलर एवं दूसरा सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है। महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम में भी प्लक्ष प्रजाति का विशाल वृक्ष है। इसी विशाल वृक्ष के मूल से सरस्वती धारा का स्रोत फूट रहा है। यह तथ्य हम पहले भी लिख चुके हैं। प्लक्ष प्रजाति के फल इनके तनों एवं शाखाओं से ही निकलते हैं। इन वृक्षों पर फूल आदि नहीं लगते हैं। यह इस प्रजाति की विशेषता है। श्री महर्षि मार्कण्डेय जी के आश्रम के निकट ऋषि परशुराम की माता रेणुका का आश्रम आज भी है। यहाँ भी गूलर के वृक्ष बहुतायत से मिलते हैं। एक ऐसे प्लक्ष वृक्ष के मूल से जल स्रोत फूट रहा है। इससे ज्ञात होता है कि हिमाचल प्रदेश के नाहन तहसील का यह क्षेत्र ही शास्त्रों में वर्णित प्लक्षप्रस्रवण है।
हरियाणा एवं राजस्थान के प्राचीन सरोवरों एवं बावली के जल का रेडियोधर्मिता एवं अन्य वैज्ञानिक विधियों से विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण से पता लगता है कि यह संचित जल प्राचीन अनादि काल का है। भारत के इस भू-भाग में भयंकर सूखा पड़ने से कोई थोड़ा बहुत प्राचीन जल स्रोत या बावली बच रही होगी, जिसका कि यह जल है जो कि अति प्राचीन है। हमारे देश में यहाँ की नदियों का नामकरण करने की परम्परा विशिष्टता लिये हुए है। नदियों का नामकरण महापुरुष, देवी देवताओं, ऋषि मुनियों एवं भौगोलिक स्थान से लिया गया है। उदाहरण के लिये, राजा भगीरथ गंगा जी को पृथ्वी पर लेकर आये थे। अतः इसी नदी को भागीरथी भी कहा गया है। यमुना नदी को यमराज देव की बहन के रूप में जाना जाता है। यमुना का नाम कालिन्दी भी है। यह नदी कालिन्दी पर्वत के समीप से बहती है। एक अन्य नदी जो कि चित्रकूट की पहाड़ियों से निकलकर धीरे-धीरे (मन्द-मन्द) गति से बहती है, इसे मन्दाकिनी कहते हैं। हिमालय पर्वत से निकलने वाली मंदाकिनी अन्य है। चित्रकूट की पहाड़ियाँ बाँदा जिले में हैं। यहीं पर ऋषि अत्रि एवं अनुसूया का आश्रम है। इसी चित्रकूट वन में श्री रामचन्द्र जी ने वनवास किया था।
कोई भी बड़ी नदी छोटी-छोटी धाराओं से मिलकर बनती है। गंगा जी की भी तीन धारायें हैं। भागीरथी नदी गोमुख से प्रकट होती है। देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनन्दा एवं मन्दाकिनी धारा ये मिलकर गंगा जी को अपना स्वरूप प्रदान करती हैं। ऋषि वेद व्यास ने विपासा नदी के तट पर घोर तप किया था। अतः इस नदी का नाम व्यास प्रचलित हो गया। वडोदरा जिले में बहने वाली नदी विश्वामित्री कहलाती है। इसका ऋषि विश्वामित्र से अवश्य ही सम्बन्ध रहा होगा।
द्वापर युग में महाभारत के काल में ही सरस्वती नदी में जल की न्यूनता होने के कारण इसका बहाव क्षीण हो गया था। ऋषि मार्कण्डेय जी के अथक प्रयास एवं तप के कारण ही इस नदी का पुनर्जन्म इनके पवित्र आश्रम में प्लक्ष वृक्ष के मूल से हुआ। इसी कारण इस नदी का नाम मार्कण्डेय नदी पड़ा। ऋषि मार्कण्डेय महान तपस्वी थे। बृहन्नारदीय पुराण में भी इस धारा के पुनर्जन्म का वर्णन मिलता है। जैसा कि पहले भी वर्णन किया गया है, सरस्वती नदी की बहुत सी छोटी-छोटी धारायें शिवालिक पर्वत से निकलती हैं। इनका प्रवाह जिला यमुनानगर, अम्बाला एवं कुरुक्षेत्र में है। महाभारत काव्य एवं अन्य पुराणों में सरस्वती नदी के उद्गम के बारे में काफी कुछ वर्णित पाया जाता है। प्राचीन कालीन प्लक्ष वृक्ष मार्कण्डेय आश्रम में आज भी विद्यमान है। इसका विकराल रूप इस बात का प्रमाण है कि यह अति प्राचीन है। इसकी आयु का अनुमान लगाना कठिन है। प्लक्ष (वट) प्रजाति के वृक्ष काफी समय तक जीवित रह जाते हैं। इन वृक्षों से हवाई जड़ें निकलकर हवा में नीचे की ओर लटकी रहती हैं। कुछ समय पश्चात् ये जड़ें भूमि में समा जाती हैं और मूल वृक्ष को पोषण प्रदान करती हैं। कुछ वर्षों के बाद यही जड़ें तनों का रूप धारण कर लेती हैं और मुख्य वृक्ष को सहारा देती हैं। कालान्तर में मूल वृक्ष क्षीण हो जाता है। यही जड़ तना बन जाती है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है और यह वृक्ष अनन्त समय तक खड़ा रह सकता है। पाठकों से अनुरोध है कि पुराणों में वर्णित इस कथन की पुष्टि ऋषि मार्कण्डेय जी के आश्रम में स्वयं पधार कर करें। यह आश्रम कालाअम्ब से पौंटा साहिब जाने वाले मार्ग पर जोगी वन में स्थित है। इसी के समीप प्राचीन आदि बद्री का प्राचीन मन्दिर भी स्थित है। यह स्थान शिवालिक पर्वत माला की भूमि पर है। इसी स्थल के पास हरियाणा सरकार द्वारा सरस्वती नदी का उद्गम स्थल भी चिन्हित किया गया है। इससे थोड़ी दूर पर व्यासपुर (बिलासपुर) कस्बा है। प्राचीन काल में इसी स्थान पर ऋषि वेद व्यास ने पुराणों की रचना की थी। यहाँ पर एक प्राचीन जलकुण्ड भी है जिसे व्यास कुण्ड कहते हैं। यह स्थान महाभारत काल का है। इसी स्थान पर महाभारत की समाप्ति पर राजा दुर्योधन आकर छिप गये थे। महाभारत काव्य में इस स्थान को व्यास ह्रद भी कहा गया है।
पुराणों में देवी सरस्वती का प्लक्ष वृक्ष से प्रकट होने के प्रमाण
ब्रह्मा जी की पुत्री सरस्वती का प्लक्षप्रस्रवण में प्लक्ष के मूल से उत्पन्न होने का विवरण वामन पुराण, स्कन्द पुराण, बृहन्नारदीय पुराण, पद्म पुराण व महाभारत में मिलता है। ऐसा महामुनि मार्कण्डेय जी के तप के फलस्वरूप हुआ यह भी स्पष्ट है। निम्नलिखित श्लोकों में यह प्रमाण मिलते हैं:
वामन पुराण में;
लोमहर्षण उवाच— प्लक्षवृक्षात्समुद्भूता सरिच्छ्रेष्ठा सनातनी। सर्वपापक्षयकरी स्मरणादपि नित्यशः।।३।। सैषा शैलसहस्राणि विदार्य च महानदी। प्रविष्टा पुण्यतोयैषा वनं द्वैतमिति श्रुतम्।।४।।
लोमहर्षण बोले— सरिताओं में श्रेष्ठ तथा सनातनी नदी प्लक्षवृक्ष से (पाकर से) प्रकट हुई तथा स्मरण मात्र से भी नित्य ही सब पापों को क्षय (नाश) करने वाली है।।३।। वही यह महानदी सहस्रों (हजारों) पर्वतों को विदीर्ण करके यह पवित्र जल वाली द्वैतवन में प्रविष्ट हुई। ऐसा हमने सुना है।।४।।
तस्मिन् प्लक्षे स्थितां दृष्ट्वा मार्कण्डेयो महामुनिः। प्रणिपत्य तदा मूर्ध्ना तुष्टावाथ सरस्वतीम्।।५।। एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिह्वा सरस्वती। प्रत्युवाच महात्मानं मार्कण्डेयं महामुनिम्। यत्र त्वं नेष्यसे विप्र तत्र यास्याम्यतन्द्रिता।।१३।।
उस समय महामुनि मार्कण्डेय ने उस प्लक्ष (पिलखन) वृक्ष में स्थित सरस्वती को देखकर मस्तक से प्रणाम करके स्तुति की।।५।। जब इस प्रकार स्तुति की तब उस भगवान् विष्णु की जिह्वा रूपी सरस्वती देवी ने महात्मा महामुनि मार्कण्डेय को उत्तर दिया। हे विप्र! जहाँ तुम मुझको ले जाओगे वहाँ मैं आलस्य को त्याग कर जाऊँगी।।१३।।
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये सरस्वतीस्तोत्रं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः।३२।
तत्र देवी ददर्शाथ पुण्यां पापविमोचनीम्। प्लक्षजां ब्रह्मणः पुत्रीं हरिजिह्वां सरस्वतीम्।।१३।। सुदर्शनस्य जननीं हृदं कृत्वा सुविस्तृतम्। तस्यास्तज्जलमासाद्य स्नात्वा प्रीतोऽभवन्नृपः।।१४।।
उस वन में प्रवेश करने के अनन्तर वहाँ पर पापों को नाश करने वाली भगवान हरि की जिह्वा ब्रह्मा जी की पुत्री प्लक्ष (पाकर) से उत्पन्न होने वाली पवित्र सरस्वती देवी को देखा।।१३।। जो सुदर्शन की माता है। उसको देखा। पुनः शोभनविस्तार युक्त सरोवर का निर्माण करके और सरस्वती का जल उसमें लाकर तथा स्नान करके राजा प्रसन्नता को प्राप्त हुआ।।१४।।
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये द्वाविंशोऽध्यायः।।२२।।
स्कन्द पुराण में बड़वानल नामक अग्नि को देवताओं के अनुरोध पर भगवान् विष्णु ने समुद्र तक ले जाने के लिए सरस्वती को यान (सवारी) रूप बनाया।
स्वतेजसा द्योतयन्ती सर्वमाभासयज्जगत्। ततो विसृज्य तां देवी नदी भूत्वा सरस्वती।।४०।। हिमवन्तं गिरिं प्राप्य प्लक्षात्तत्र विनिर्गता। अवतीर्णा धरा पृष्ठे मत्स्यकच्छपसङ्कुला।।४१।।
अपने तेज से प्रकाशित होती हुई उसने सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित कर दिया। उसके अनन्तर उस गंगा देवी को त्याग कर स्वयं नदी का रूप धारण कर सरस्वती हिमालय पर्वत पर पहुँच कर वहाँ प्लक्ष (पाकर) से प्रकट हुई।।४०–४१।।
इति स्कन्द म० पु० ऐम० प्रभास खं० (प्र० क्षे० मा० १) ३३ एष अध्या० निरूपितम्।।
बृहन्नारदीय पुराण में;
रामतीर्थं ततः ख्यातं सञ्जातं पापनाशनम्। मार्कण्डेयेन मुनिना सन्तप्तं परमं तपः।।७।। यत्र तत्र समायाता प्लक्षजाता सरस्वती। सा सभाज्य स्तुता तेन मुनिना धार्मिकेण ह। सरः सैनिहितं प्लाव्य पश्चिमां प्रस्थिता दिशम्। कुरुणा तु ततः कृष्टं यावत्क्षेत्रं समन्ततः।।
यहाँ पर मार्कण्डेय मुनि ने परम तप किया था। वहाँ पर प्लक्ष से उत्पन्न होने वाली सरस्वती आई अर्थात् प्रकट हुई। उस धार्मिक मुनि के द्वारा स्तुति (प्रशंसित) वह भी मुनि का सम्मान करके पुनः सन्निहित सर को प्लावन (पूर्ण भर) करके पश्चिम दिशा को प्रस्थान किया (चली गई) तब से यावत्परिमाण (जितने माप) में क्षेत्र था उसको चारों ओर से कुरु ने कर्षण किया।।
इति बृहन्नारदीयपुराणे उत्तरभागे कुरुक्षेत्रमाहात्म्ये क्षेत्रप्रमाणादिनिरूपणम्
पद्म पुराण में;
अधस्तात्प्लक्षवृक्षस्य अवरोप्य च तां तनुम्। अवतीर्णा महाभागा देवानां पश्यतां तदा।।१८९।।
उस काल में महाभागा सरस्वती देवताओं के देखते हुए ही अपने देव शरीर को भूमि में घुसा कर पुनः पाकर वृक्ष के नीचे से प्रकट हुई।
इति श्री पद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे नन्दा प्राची माहात्म्येऽष्टादशोऽध्यायः।।
पद्म पुराण व स्कन्द पुराण में उस प्लक्ष वृक्ष के पावन स्वरूप की भी व्याख्या मिलती है।
ततो विसृज्य तान् देवान् नदीभूता सरस्वती।।१८८।। अधस्तात्प्लक्षवृक्षस्य अवरोप्य च तां तनुम्। अवतीर्णा महाभागा देवानां पश्यतां तदा।।१८९।। विष्णुरूपस्तरुः सोऽत्र सर्वैर्देवैस्तु वन्दितः। संसेव्यश्च द्विजैर्नित्यं फलहेतोर्महोदयः।।१९०।। अनेकशाखाविततश्चतुर्मुख इवापरः।।१९१।। नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता। दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा।।२३६।।
उसके अनन्तर उन देवताओं को त्याग कर सरस्वती देवी नदी भाव को प्राप्त हो गई।।१८८।। उस काल में महाभागा सरस्वती देवताओं के देखते हुए ही अपने देव शरीर को भूमि में घुसा कर पुनः पाकर वृक्ष के नीचे से प्रकट हुई।।१८९।। इसी स्थान पर साक्षात् विष्णु रूप वह वृक्ष सब देवताओं द्वारा वन्दित (पूजित) तथा द्विजों के द्वारा नित्य ही सेवा करने योग्य और फल के कारण अति उन्नति पर है या प्रभावशाली है।।१९०–१९१।। अनेक शाखाओं के द्वारा फैला हुआ चतुर्मुख दूसरे ब्रह्मा जी के समान है। पवित्र सरस्वती नदी जगत् में स्थित होने से जैसे सुलभ है। वैसे वह कुरुक्षेत्र प्रभास क्षेत्र तथा पुष्कर में दुर्लभ भी है।।२३६।।
वृक्ष के विस्तृत मुख्य तने व अन्य सहायक तनों को ध्यान से देखने से चार खंड प्रतीत होते हैं। मुख्य विशाल तने अधिकतर खोखले हैं व छोटे बालक खेल खेल में नीचे से प्रवेश कर ऊपर निकल आते हैं। ऐसा ही वर्णन स्कन्द पुराण के ये श्लोक करते हैं।
उद्भूता सा तदा देवी अधस्ताद्वृक्षमूलतः। तत्कोटरकुटी कोटिप्रविष्टानां द्विजन्तूनाम्।।२२।। श्रूयन्ते वेदनिर्घोषा सरसारक्तचेतसाम्। विष्णुरास्ते तत्र देवो देवानां प्रवरो गुरुः।।२३।। तस्मात्स्थानात्ततो देवी प्रतीच्याभिमुखं ययौ।।२४।।
उस वृक्ष के कोटर (मध्य में खोखला भाग) रूप कुटी में प्रविष्ट हुए तथा प्रेम से रंगा हुआ चित्त जिनका ऐसे करोड़ संख्याक द्विजों की वेदध्वनियाँ सुनी जाती हैं। वहीं पर देवताओं के मुख्य शासक भगवान विष्णु देव विराजते हैं अर्थात् उनका स्थान है।।२३।। उस स्थान से वह देवी पश्चिम दिशा को मुख करके चली गई।
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे श्रीहाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये सरस्वत्युपाख्याने सरस्वतीशापमोचनसाम्भ्रमत्युत्पत्तिकृतन्तवर्णनं नाम त्रिसप्तत्युत्तरशततमोऽध्यायः।।१७३।।
महाभारत ग्रंथ में महामुनि वेद व्यास ने युद्ध के समय बलराम जी की सरस्वती के तटवर्ती तीर्थों की यात्रा का उल्लेख किया है। यात्रा सरस्वती के समुद्र संगम से प्रारम्भ करके, देव नदी के उद्गम स्थान तक की वर्णित है। यह स्पष्ट वर्णन किया गया है कि शिवालिक पहाड़ियों में पाखड़ वृक्ष की जड़ों से उत्पन्न सरस्वती के जल में स्नान करने के उपरान्त, बलराम जी शीघ्र ही यमुना नदी पर पहुँच गये।
सौगन्धिकवनं राजन् ततो गच्छेत् मानवं।।४।। तद्वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते। ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी।।६।। प्लक्षाद्देवी स्रुता राजन् महापुण्या सरस्वती। तत्राभिषेकं कुर्वीर वाल्मीकान्निःसृते जले।।७।।
हे राजन्! वहाँ से मानव सौगन्धिक वन को जाए।।४।। उस वन में प्रवेश होते ही सब पापों से मुक्त हो जाता है। हे राजन्! उस वन में श्रेष्ठ सरिता और सब नदियों में उत्तम तथा महापवित्र सरस्वती देवी प्लक्ष से टपकती है वहाँ पर वल्मीक (बाम्ही) से निकलने वाले जल में स्नान करे।।६–७।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्तीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्यायः।।८४।। (एवं श्री प० पु० स्व० खं० अ० २, श्लोक ६,७)
आगे बलराम जी की इस क्षेत्र की यात्रा का वर्णन है।
श्रुत्वा ऋषीणां वचनमाश्रमं तं जगाम ह। ऋषींस्तानमभिवाद्यार्थ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः।।१।। सन्ध्या-कार्याणि सर्वाणि निर्वर्त्याऽऽरुरोहेऽचलम्। नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली।।१०।। पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः। प्रभवं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं बलः।।११।। सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम्। हलायुधस्तत्र चापि दत्वा दानं महाबलः।।१२।। आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ। सन्तर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः।।१३।। तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह। मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः।।१४।। इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक् प्रीतिमाप्नुवन्। तं देशं कारपवनाद् यमुनायां जगाम ह।।१५।।
ऋषियों के वचन को सुनकर वह अच्युत हलधर उस आश्रम में गए। जो हिमालय के पार्श्व भाग (बगल) में विद्यमान था। वहाँ ऋषियों को अभिवादन (प्रणाम) करके सब सन्ध्या कार्यों को निपटाकर तत्पश्चात् पर्वत पर चढ़े। वह ताल वृक्ष के चिह्न युक्त ध्वजा वाले बलवान राम (पर्वत पर अतिदूर न जाकर थोड़ी दूर) वहाँ से पवित्र श्रेष्ठ तीर्थ को देखकर परम विस्मय (आश्चर्य) को प्राप्त हुए। पुनः जो सरस्वती का उद्गम स्थान तीर्थों में उत्तम तथा कारपवन मुख्य प्लक्ष प्रस्रवण नाम तीर्थ को बलराम सम्प्राप्त हुए। अर्थात् वहाँ पहुँच गए। वहाँ पर भी महाबलवान हल शस्त्र धारी राम ने सरस्वती के पवित्र सुशीत शुद्ध स्वच्छ जल में स्नान किये हुये दान देकर रणदुर्मद बलराम ने देवता और पितरों को तर्पण किया।।१३।। और यति (सन्यासी) तथा ब्राह्मणों के सहित अच्युत बलराम एक रात्रि वहाँ पर निवास करके पुनः मित्र और वरुण दोनों ऋषियों के पवित्र आश्रम को चले गये।।१४।। यहाँ पर पूर्व (पहले) इन्द्र, अग्नि, और अर्यमा देवता प्रसन्नता को प्राप्त हो चुके थे। कारपवन से यमुना पट्टी में स्थित उस देश (स्थान) को गये।।१५।।
इति श्री-महाभारते शल्यपर्वणि गदापर्व- बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने सङ्क्षिप्तश्चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
उपर्युक्त क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति आज भी ऐसी है कि प्लक्षप्रस्रवण और यमुना के बीच का फासला कुछ १५–१६ किलोमीटर का ही है। बलराम जी की तीर्थ यात्रा में सूचित तीर्थ स्थान आज भी विराजमान हैं। तो फिर इस कथन में कोई संशय नहीं रह जाता कि मार्कण्डेय जी के आश्रम में स्थित पाखड़ से उत्पन्न जलधारा ही देव नदी सरस्वती का उद्गम स्थान है। २०१० में प्रकाशित सुन्दर पुस्तक में माइकेल डेनिनो ने गहन खोज करके यह सिद्ध कर दिया है कि पूर्व काल में सरस्वती नदी उत्तर-पश्चिम भारत में अवश्य बहती थी। नासा ने भी उपग्रहों द्वारा प्राप्त जानकारी से इस बात की पुष्टि की है। डेनिनो ने मारकण्डा का ही सरस्वती का प्रारंभिक भाग होने की तीव्र सम्भावना जताई है। श्री ओ.पी. भारद्वाज ने अपनी पुस्तक "वैदिक हड़प्पा सभ्यता" में प्लक्षप्रस्रवण का नाहन क्षेत्र में होने का तथ्य पेश किया है। होशियारपुर से साधु सेवा मुंशी राम सूद ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तिका "श्री सरस्वती महानदी निर्णय" में परमहंस सरस्वती स्वामी जी ने मारकण्डा का ही सरस्वती होने का विस्तार से उल्लेख किया है।